Railway Signalling System कैसे काम करता है? | How Railway Signalling System Works in Hindi

भारत में रेलवे नेटवर्क दुनिया के सबसे बड़े नेटवर्क में से एक है। हर दिन लाखों यात्री और हज़ारों ट्रेनें एक साथ ट्रैक पर चलती हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है — How Railway Signalling System Works? यानी, इतने विशाल नेटवर्क में ट्रेनें बिना टकराए, समय पर और सुरक्षित कैसे चलती हैं?

इसका जवाब छिपा है Railway Signalling System में — जो एक उन्नत, तकनीकी और फेल-सेफ व्यवस्था है। आइए इस सिस्टम को विस्तार से समझते हैं 👇

रेलवे सिग्नलिंग सिस्टम को समझने से पहले अगर आप जानना चाहते हैं कि Railway Ticket Booking System कैसे काम करता है तो यह लेख ज़रूर पढ़ें।
यह आपको पूरी रेलवे प्रक्रिया की एक स्पष्ट समझ देगा।


Table of Contents

🚉 Railway Signalling System का परिचय

रेलवे सिग्नलिंग सिस्टम एक ऐसी प्रणाली है जो रेलवे नेटवर्क में चल रही ट्रेनों को सुरक्षित और व्यवस्थित रूप से नियंत्रित करती है। यह सिस्टम तय करता है कि कौन सी ट्रेन कब और किस ट्रैक पर चलेगी, कौन सी रुकेगी और किसे आगे बढ़ने की अनुमति होगी।

👉 सरल शब्दों में, How Railway Signalling System Works को समझना मतलब है — यह जानना कि रेलवे ट्रेन को कौन, कब और कैसे “चलो” या “रुको” का आदेश देता है।

इसमें सिग्नल, ट्रैक सर्किट, इंटरलॉकिंग, पॉइंट मशीन, सेंसर, GPS और अब AI जैसी आधुनिक तकनीकें शामिल हैं।


🕰️ इतिहास: How Railway Signalling System Works की शुरुआत

रेलवे सिग्नलिंग की शुरुआत बहुत साधारण तरीके से हुई थी।

🟢 मैनुअल झंडी और लैंप सिस्टम (19वीं सदी)

शुरुआत में ट्रेनों को सिग्नल देने के लिए स्टेशन कर्मचारी हरी झंडी या हरा लैंप दिखाते थे। लाल रंग रुकने का संकेत देता था।

लेकिन यह सिस्टम इंसानी गलती पर निर्भर था। कोहरे, रात या लापरवाही के कारण दुर्घटनाएँ होती थीं।

🟡 सेमाफोर और लीवर युग

20वीं सदी में रेलवे ने सेमाफोर सिग्नल लगाए — बड़ी लोहे की भुजाएँ जो ऊपर-नीचे होकर “रास्ता साफ” या “रुको” का संकेत देती थीं। इन्हें स्टेशन पर लीवरों से नियंत्रित किया जाता था।

🔴 इलेक्ट्रो-मैकेनिकल और ट्रैक सर्किट सिस्टम

इसके बाद सिग्नल को इलेक्ट्रिकल सर्किट से जोड़ दिया गया। ट्रैक पर करंट डालकर ट्रेन की उपस्थिति ऑटोमैटिकली डिटेक्ट होने लगी और सिग्नल अपने आप बदलने लगे।

🛰️ GPS और कंप्यूटर युग (आधुनिक दौर)

आज भारत में कई जगह GPS, माइक्रोप्रोसेसर इंटरलॉकिंग और KAVACH जैसे स्वदेशी सुरक्षा सिस्टम लग चुके हैं। ये रियल टाइम में ट्रेन को ट्रैक करते हैं और ऑटोमैटिक ब्रेकिंग तक कर सकते हैं।

👉 इतिहास को समझने से हमें साफ पता चलता है कि समय के साथ How Railway Signalling System Works में कितना बड़ा परिवर्तन हुआ है।


🎯 रेलवे सिग्नलिंग सिस्टम के उद्देश्य

रेलवे सिग्नलिंग सिस्टम के पांच प्रमुख उद्देश्य होते हैं:

  1. 🚦 सुरक्षा (Safety): ट्रेनों को टकराव से बचाना।
  2. 🧭 रूट नियंत्रण: हर ट्रेन के लिए सही रूट निर्धारित करना।
  3. ट्रैफिक प्रबंधन: एक ही ट्रैक पर कई ट्रेनों को सुव्यवस्थित रूप से चलाना।
  4. 🧠 मानव त्रुटि कम करना: मशीन से काम लेकर गलती की संभावना घटाना।
  5. 🚆 नेटवर्क क्षमता बढ़ाना: कम दूरी पर ज़्यादा ट्रेनें चलाना।

👉 यही उद्देश्य मिलकर पूरी व्यवस्था को समझाते हैं कि How Railway Signalling System Works practically.


⚙️ सिग्नलिंग सिस्टम के प्रकार

भारत में रेलवे सिग्नलिंग के 4 मुख्य प्रकार हैं 👇

1️⃣ मैनुअल सिग्नलिंग

सबसे पुराना सिस्टम, जिसमें झंडी या लैंप से सिग्नल दिए जाते थे। आज बहुत सीमित इलाकों में प्रयोग होता है।

2️⃣ सेमी-ऑटोमैटिक सिग्नलिंग

इसमें कुछ सिग्नल ऑटोमैटिक होते हैं, लेकिन हरा करने के लिए स्टेशन मास्टर की अनुमति चाहिए।

3️⃣ ऑटोमैटिक सिग्नलिंग

आधुनिक रूट्स पर यही प्रयोग होता है। जैसे ही ट्रेन ब्लॉक में प्रवेश करती है, सिग्नल अपने आप लाल हो जाता है, और ट्रेन निकलते ही हरा।

4️⃣ कैब सिग्नलिंग सिस्टम

इसमें सिग्नल सीधे इंजन के अंदर डिजिटल स्क्रीन पर दिखता है। कोहरे या दृश्यता कम होने पर यह बहुत कारगर है।

👉 इन चारों प्रकारों को समझे बिना यह समझ पाना संभव नहीं कि How Railway Signalling System Works in India


🟡 सिग्नल के रंग और उनका मतलब

रेलवे सिग्नलिंग में रंगों का बेहद अहम रोल है। ये रंग ड्राइवर को बताते हैं कि आगे क्या स्थिति है:

  • 🔴 लाल (Stop): ट्रेन को तुरंत रुकना है।
  • 🟡 पीला (Caution): सावधानी से चलें, अगला सिग्नल लाल हो सकता है।
  • 🟢 हरा (Proceed): रास्ता साफ है, ट्रेन आगे बढ़ सकती है।
  • 🟡🟡 डबल पीला: आने वाले सिग्नल के बारे में अग्रिम चेतावनी।

👉 यही रंग प्रणाली असल में बताती है कि How Railway Signalling System Works step by step.


🧰 सिग्नलिंग में इस्तेमाल होने वाले उपकरण

🚉 Track Circuit

ट्रैक में करंट प्रवाहित कर ट्रेन की उपस्थिति पता लगाई जाती है।

🔐 Interlocking System

यह सिस्टम तय करता है कि एक समय में केवल एक ही रूट से ट्रेन जा सके। Relay और Computer आधारित दोनों इंटरलॉकिंग भारत में प्रचलित हैं।

🧭 Point machine

ट्रैक को एक दिशा से दूसरी दिशा में बदलने के लिए।

🚦 Signal Post

ट्रैक के किनारे लगे सिग्नल पोल जिन पर लाइट्स होती हैं।

👉 यही उपकरण असली आधार हैं जिनसे How Railway Signalling System Works practically संभव होता है।


🔌 Track Circuit कैसे काम करता है

Track Circuit रेलवे की “आँख” होता है।

  • पटरियों में करंट डाला जाता है।
  • ट्रेन आने पर उसके पहिए रेल को शॉर्ट कर देते हैं → सिग्नल लाल।
  • ट्रेन निकलते ही ब्लॉक क्लियर हो जाता है → सिग्नल हरा।

कई जगह Axle Counter का भी उपयोग होता है, जो ट्रैक सेक्शन में आने और बाहर जाने वाले पहियों की गिनती करता है।


🔐 Interlocking System और उसका रोल

Interlocking यह सुनिश्चित करता है कि जब एक रूट पर ट्रेन जा रही है, तो उससे जुड़ा कोई दूसरा रूट ओपन न हो सके।

  • रूट सेट करने के बाद सभी पॉइंट्स लॉक हो जाते हैं।
  • सिग्नल तभी हरा होता है जब रूट पूरी तरह सुरक्षित हो।
  • ट्रेन निकलने के बाद ही रूट रिलीज होता है।

👉 यह सिस्टम मानव गलती को लगभग खत्म कर देता है।


🛰️ आधुनिक टेक्नोलॉजी में How Railway Signalling System Works

भारत में अब कई आधुनिक तकनीकें जुड़ चुकी हैं 👇

  • 📡 GPS ट्रैकिंग: रियल टाइम में ट्रेन की लोकेशन जानने के लिए।
  • 🧠 AI आधारित Fault Detection: सिस्टम की खराबी पहले ही पकड़ लेना।
  • 💻 Microprocessor Interlocking: तेज़ और सटीक रूट सेटिंग।
  • 🇮🇳 KAVACH सिस्टम: दो ट्रेनों के बीच ऑटोमैटिक ब्रेक लगाकर दुर्घटना रोकता है।

👉 आधुनिक टेक्नोलॉजी ने How Railway Signalling System Works in modern trains को पूरी तरह बदल दिया है।


📊 How Railway Signalling System Works – Step by Step प्रोसेस

how railway signalling system works step by step diagram in hindi
Step by Step Diagram – How Railway Signalling System Works | रेलवे सिग्नलिंग सिस्टम कैसे काम करता है इसका इंफोग्राफिक उदाहरण।
  1. 🚉 ट्रेन की लोकेशन Track Circuit से पता चलती है।
  2. 🔐 Interlocking सिस्टम रूट को लॉक करता है।
  3. 🚦 सिग्नल हरा होता है।
  4. 🚄 ट्रेन ब्लॉक में प्रवेश करती है।
  5. 🔁 पिछला ब्लॉक क्लियर होते ही अगले ट्रेन को अनुमति मिलती है।

👉 यही Step-by-Step सिस्टम बताता है कि How Railway Signalling System Works practically on ground.


🧮 हेडवे और नेटवर्क क्षमता

हेडवे का मतलब होता है दो ट्रेनों के बीच न्यूनतम सुरक्षित दूरी।
सिग्नलिंग जितनी उन्नत होगी, हेडवे उतना कम होगा — और उतनी अधिक ट्रेनें एक ही ट्रैक पर सुरक्षित रूप से चलाई जा सकेंगी।

  • पुराना सिस्टम = 10–15 मिनट हेडवे
  • ऑटोमैटिक सिग्नलिंग = 5–7 मिनट
  • कैब सिग्नलिंग और ETCS = 2–3 मिनट तक संभव ✅

⚠️ रेलवे सिग्नलिंग सिस्टम की चुनौतियाँ

  • ⚡ पुरानी तकनीक कई जगहों पर अभी भी लागू।
  • 🙍‍♂️ मानव त्रुटियों की संभावना।
  • 🌫️ कोहरा और मौसम की समस्याएँ।
  • 🛠️ मेंटेनेंस में देरी से सिग्नल फेलियर।

🚀 भविष्य की सिग्नलिंग तकनीकें

  • 🌍 ETCS (European Train Control System)
  • 🇮🇳 KAVACH का विस्तार
  • 🤖 AI और IoT आधारित सिग्नलिंग
  • 📡 Moving Block Concept — जिसमें फिक्स्ड ब्लॉक्स की जगह ट्रेनों के बीच की दूरी रियल टाइम में तय होती है।

🇮🇳 भारत में रेलवे सिग्नलिंग सिस्टम की वर्तमान स्थिति (2025)

  • ऑटोमैटिक सिग्नलिंग कई रूट्स पर लागू।
  • KAVACH सिस्टम दिल्ली–मुंबई और दिल्ली–हावड़ा रूट पर सक्रिय।
  • GPS आधारित मॉनिटरिंग सिस्टम लागू।
  • बड़े स्टेशनों पर Electronic Interlocking का विस्तार।

👉 भारत में अब रेलवे सिग्नलिंग का चेहरा तेजी से बदल रहा है, जिससे How Railway Signalling System Works और भी स्मार्ट हो रहा है।

🚉 वास्तविक उदाहरण: सिग्नलिंग सिस्टम कैसे ट्रेन मूवमेंट को कंट्रोल करता है

अब मान लीजिए एक वास्तविक उदाहरण:
दिल्ली से लखनऊ के बीच एक सिंगल ट्रैक पर दो ट्रेनें चल रही हैं — ट्रेन A और ट्रेन B

  1. 🚂 ट्रेन A सबसे पहले ब्लॉक में प्रवेश करती है। जैसे ही वह पहले ब्लॉक में आती है, Track Circuit उसे Occupied दिखाता है और उस ब्लॉक का सिग्नल अपने आप 🔴 लाल हो जाता है।
  2. 💻 Interlocking सिस्टम ट्रेन A के लिए पूरा रूट लॉक कर देता है, ताकि कोई दूसरी ट्रेन उस सेक्शन में न घुस सके।
  3. 🟡 ट्रेन A अगले ब्लॉक में पहुँचते ही, पिछला ब्लॉक “क्लियर” हो जाता है और सिग्नल अपने आप 🟢 हरा हो जाता है — अब ट्रेन B को आने की अनुमति मिल जाती है।
  4. 🚦 यदि ट्रेन B गलती से लाल सिग्नल पार करने की कोशिश करती है (SPAD), तो KAVACH सिस्टम तुरंत Emergency Brake लगाता है और दुर्घटना होने से रोकता है।

👉 यही Step by Step प्रक्रिया असल में बताती है कि How Railway Signalling System Works practically — रियल टाइम में ट्रेन की हर लोकेशन, हर सिग्नल, और हर रूट को एक नेटवर्क कंट्रोल करता है।


🧮 हेडवे (Headway) और नेटवर्क क्षमता की गहराई से समझ

हेडवे वह न्यूनतम समय/दूरी होती है जो दो ट्रेनों के बीच रखी जाती है ताकि टकराव की कोई संभावना न हो।
जितना हेडवे कम होगा, उतनी ही ज़्यादा ट्रेनें एक ही ट्रैक पर सुरक्षित चलाई जा सकती हैं।

सिग्नलिंग सिस्टमऔसत हेडवेट्रेनों की संख्या (प्रति घंटा)
मैनुअल सिस्टम15–20 मिनट2–3 ट्रेनें
सेमी-ऑटोमैटिक10–12 मिनट4–5 ट्रेनें
ऑटोमैटिक सिग्नलिंग5–7 मिनट8–12 ट्रेनें
कैब सिग्नलिंग + ETCS2–3 मिनट15+ ट्रेनें संभव ✅

👉 आधुनिक ऑटोमैटिक सिग्नलिंग और ETCS सिस्टम हेडवे को काफी कम कर देते हैं, जिससे क्षमता (Capacity) कई गुना बढ़ जाती है। यही कारण है कि हाई-स्पीड ट्रेनों और मेट्रो में इन तकनीकों को प्राथमिकता दी जाती है।


🧠 कंट्रोल रूम की भूमिका — ट्रेन मूवमेंट का दिमाग

रेलवे में हर रूट का एक कंट्रोल रूम होता है, जहाँ से सभी ट्रेनों की स्थिति पर नज़र रखी जाती है।

  • 🖥️ डिजिटल डिस्प्ले पैनल पर पूरे रूट का नक्शा दिखता है। हर ब्लॉक का Status (Occupied/Free) रियल टाइम में अपडेट होता है।
  • 📡 GPS और Track Circuit से डेटा कंट्रोल रूम में पहुँचता है।
  • 👨‍💻 कंट्रोलर किसी भी समय सिग्नल Override कर सकता है, ट्रेनों को Re-Route कर सकता है, या किसी ब्लॉक को Manual Mode में डाल सकता है।

👉 कंट्रोल रूम को आप रेलवे सिग्नलिंग सिस्टम का “दिमाग़” कह सकते हैं। यहीं से हर सेकंड यह तय होता है कि कौन सी ट्रेन किस ब्लॉक में जाएगी।

यही वजह है कि How Railway Signalling System Works को समझने के लिए कंट्रोल रूम की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है।


🚨 Emergency और Failure की स्थिति में सिग्नलिंग सिस्टम कैसे काम करता है

रेलवे में “Fail-Safe” डिज़ाइन का मतलब होता है — अगर सिस्टम में कोई भी खराबी हो, तो वह “Unsafe Clear” स्थिति में न जाकर सीधे Red / Stop दिखाए।

उदाहरण:

  • ❌ अगर Track Circuit फेल हो जाए → ब्लॉक को Occupied मान लिया जाएगा।
  • ❌ Interlocking में गड़बड़ी → सभी सिग्नल Red हो जाएंगे, ताकि कोई ट्रेन न बढ़े।
  • ❌ पावर फेल → बैकअप बैटरियाँ या जनरेटर तुरंत एक्टिव हो जाते हैं।

इस स्थिति में ट्रेनों को Manual Authorisation के ज़रिए धीरे-धीरे चलाया जाता है, जिससे कोई दुर्घटना न हो।

👉 यही सुरक्षा का आधार है — अगर कुछ भी फेल हो, तो सिस्टम हमेशा “Ruko” की स्थिति में चला जाए। यही Railway Signalling को इतना भरोसेमंद बनाता है।


🌫️ कोहरे और दृश्यता कम होने की स्थिति में Signalling System

भारत में उत्तर भारत जैसे इलाकों में सर्दियों में घना कोहरा एक आम समस्या है। इस दौरान दृश्यता 10–20 मीटर तक घट जाती है।

👉 इस स्थिति में ड्राइवर को Cab Signalling System या Fog-Safe Devices से सिग्नल की जानकारी इंजन के अंदर ही दी जाती है।
👉 GPS और RFID आधारित लोकेशन सिस्टम भी ट्रेन को सही समय पर Brake / Speed Control में मदद करते हैं।
👉 कुछ जगहों पर Fog Signal Detonators (पटरियों पर लगाए जाने वाले छोटे विस्फोटक उपकरण) भी इस्तेमाल किए जाते हैं, जो ट्रेन गुजरते ही तेज़ आवाज़ करते हैं — ताकि ड्राइवर को पता चल सके कि सिग्नल कहाँ है।

इस तरह सिग्नलिंग सिस्टम खराब मौसम में भी ट्रेन को सुरक्षित तरीके से चलाने में सक्षम रहता है।


🛠️ मेंटेनेंस और मॉनिटरिंग — सिग्नलिंग की रीढ़

रेलवे सिग्नलिंग सिस्टम लगातार 24×7 काम करता है। इसके लिए नियमित रखरखाव और मॉनिटरिंग की व्यवस्था होती है 👇

  • 🔧 Track Circuits और Axle Counters की नियमित टेस्टिंग।
  • 🧰 Signal Lamps, LED और पॉइंट मशीनों की हेल्थ चेक।
  • 💻 आधुनिक सिस्टम में IoT सेंसर से फेल्योर की भविष्यवाणी की जाती है (Predictive Maintenance)।
  • 📝 प्रत्येक खराबी का लॉग रखा जाता है ताकि भविष्य में सुधार किया जा सके।

👉 यही मेंटेनेंस व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि How Railway Signalling System Works बिना रुके और बिना गलती के चलता रहे।


🛰️ ETCS और Moving Block — सिग्नलिंग का भविष्य

ETCS (European Train Control System) लेवल 2 और 3 में Fixed Block की जगह “Moving Block” तकनीक आती है। इसमें ट्रेन की सुरक्षित दूरी GPS और रेडियो से Calculate होती है, न कि Fixed Signals से।

  • 🚄 इससे हेडवे बहुत घट जाता है।
  • 📡 ट्रेनों को अनुमति सिग्नल से नहीं बल्कि डिजिटल डेटा के ज़रिए दी जाती है।
  • 🧠 सिस्टम खुद तय करता है कि कौन-सी ट्रेन कितनी दूरी बनाए रखे।

👉 भारत में KAVACH और ETCS जैसी तकनीकें धीरे-धीरे लागू की जा रही हैं। इससे सिग्नलिंग सिस्टम और भी स्मार्ट हो जाएगा।

🏁 निष्कर्ष (Conclusion)

अब तक आपने विस्तार से समझ लिया कि How Railway Signalling System Works — यानी रेलवे सिग्नलिंग सिस्टम किस तरह विशाल रेलवे नेटवर्क में ट्रेनों को सुरक्षित, व्यवस्थित और समय पर संचालित करता है।

रेलवे सिग्नलिंग सिर्फ लाल, पीले और हरे लाइटों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक उन्नत तकनीकी व्यवस्था है जिसमें Track Circuits, Axle Counters, Interlocking Systems, GPS, KAVACH और आधुनिक कंप्यूटर आधारित तकनीकें साथ मिलकर काम करती हैं।

यह सिस्टम सुनिश्चित करता है कि —

  • दो ट्रेनें कभी भी एक ही ट्रैक पर आमने-सामने न आएं,
  • सभी रूट सही समय पर लॉक और क्लियर हों,
  • और किसी भी खराबी या आपात स्थिति में सिस्टम “Fail-Safe” मोड में चला जाए।

भारत में रेलवे सिग्नलिंग सिस्टम को लगातार आधुनिक बनाया जा रहा है। Automatic Block Signalling, Electronic Interlocking, GPS Monitoring और KAVACH जैसी स्वदेशी तकनीकें देश के रेलवे को और भी सुरक्षित बना रही हैं।

भविष्य में ETCS (European Train Control System) और Moving Block Technology के आने से यह सिस्टम और भी स्मार्ट, तेज़ और कुशल होगा — जिससे भारत की रेल सेवाएँ विश्वस्तरीय स्तर पर पहुँचेंगी। 🚄🇮🇳

👉 इसलिए, अगली बार जब आप ट्रेन में सफर करें और ट्रैक के किनारे चमकती सिग्नल लाइट देखें, तो याद रखें — उसके पीछे एक बहुत बड़ा और बुद्धिमान सिस्टम काम कर रहा है… यही असली जवाब है कि How Railway Signalling System Works


FAQs – How Railway Signalling System Works

1. रेलवे सिग्नलिंग सिस्टम क्या होता है?

👉 रेलवे सिग्नलिंग सिस्टम एक तकनीकी व्यवस्था है जो ट्रेनों की लोकेशन, रूट और मूवमेंट को नियंत्रित करती है, ताकि ट्रेनों के बीच सुरक्षित दूरी और सही संचालन सुनिश्चित हो सके।


2. भारत में कौन-कौन से सिग्नलिंग सिस्टम इस्तेमाल होते हैं?

👉 भारत में वर्तमान में चार प्रमुख सिग्नलिंग सिस्टम प्रयोग में हैं:

  • मैनुअल सिग्नलिंग
  • सेमी-ऑटोमैटिक सिग्नलिंग
  • ऑटोमैटिक ब्लॉक सिग्नलिंग
  • कैब सिग्नलिंग सिस्टम
    इनका उपयोग रूट की व्यस्तता और तकनीकी क्षमता के अनुसार किया जाता है।

3. Track Circuit और Axle Counter में क्या फर्क है?

👉 Track Circuit ट्रैक में करंट डालकर ट्रेन की उपस्थिति पता करता है, जबकि Axle Counter ट्रेन के प्रवेश और निकास पर पहियों की गिनती करके ट्रैक सेक्शन की स्थिति बताता है।

  • Track Circuit निरंतर निगरानी देता है।
  • Axle Counter गंदे बैलास्ट या खराब जोड़ों में भी बेहतर काम करता है।

दोनों का संयोजन आधुनिक सिग्नलिंग में आम है।


4. कोहरे या खराब मौसम में सिग्नलिंग सिस्टम कैसे काम करता है?

👉 कोहरे में दृश्यता कम होने पर Cab Signalling System, GPS और RFID आधारित सिस्टम ड्राइवर को इंजन के अंदर ही सिग्नल दिखाते हैं। कुछ जगहों पर Fog Detonators भी इस्तेमाल होते हैं जो आवाज़ से सिग्नल का संकेत देते हैं। इससे ट्रेनों की सुरक्षा बनी रहती है।


5. KAVACH सिस्टम क्या है और यह कैसे काम करता है?

👉 KAVACH भारतीय रेलवे द्वारा विकसित एक स्वदेशी सुरक्षा प्रणाली है। यह ट्रेन की लोकेशन GPS और RFID से ट्रैक करता है। अगर कोई ट्रेन लाल सिग्नल पार करने की कोशिश करती है या सामने कोई ट्रेन है, तो KAVACH Emergency Brake लगाकर टकराव रोक देता है।

👉 यही आधुनिक सिस्टम बताता है कि आज के समय में How Railway Signalling System Works कितनी उन्नत और सुरक्षित हो चुकी है।

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